अगर आप करते है PayTM इस्तेमाल तो हो जाए सावधान !!!

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डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा देते हुए आज के समय लोग अंधाधुंध तरीके से पेटीएम का इस्तेमाल कर रहे हैं। चाहे वो घर का सामान लाना हो या फिर कोई भी काम करना हो बस मोबाइल निकालो और पेमेंट कर दो। इस ऐप  से जितनी लोगों को सुविधा हुई उतनी ही परेशानियों का सामना लोगों को करना पड़ रहा है। दरअसल इस ऐप में कई सारी टेक्निकल फ्लाट का सामना लोगों को करना पड़ रहा है। बैंक खाते से पैसे तो काट लिए जाते है लेकिन वो पैसे वॉलेट में नहीं पहुंचते हैं। अगर कोई व्यक्ति इसकी शिकायत कस्टमर केयर पर करने की कोशिश करता है तो घंटों फोन लगाने के बाबजूद फोन नहीं उठाया जाता है।

एक पेटीएम ग्राहक दूसरे पेटीएम ग्राहक को पैसे भेजता है तब 13 दिन बीत जाते है लेकिन पैसों का ट्रांसफर नहीं होता है। इस बात को जरा आसानी से समझिए अगर आप किसी ढ़ाबे पर यह बोलकर खाना खाते हैं कि आपको ई-वॉलेट या पेटीएम के जरिए अपने खाने का बिल पे करना है और खाना खाने के बाद आपको पता चलता है कि आपके दोस्त ने जो पेटीएम में पैसा था दरअसल वो तो आया ही नहीं। ऐसी स्थिति में आपके पास ना तो पैसे हो और ना ही आप घर के इतने करीब है कि पैसे लाकर उसको दें दे। उस स्थिति में आपके पास सिर्फ एक ही विकल्प है आप पैसे आने का इंतजार करें और जब इतंजार 72 से ज्यादा घंटे का हो तो जाहिर सी बात है बांध तो टूटना ही है। तब वो क्या बर्तन धोकर पैसे देगा या फिर वहां खड़े होकर भीख मांगेगे।

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यहां तक तो ठीक है लेकिन अगर आप इमरजेंसी हालात में और आपके दोस्त आपकी मदद के लिए पैसे भेज रहे हो तब आप क्या करेंगे। पैसा आपका ही है लेकिन वक्त पर काम ना आए तो वो पैसे की सेज भी किसी के काम नहीं आती है।

ऐसे हालातों में भी आप कस्टमर केयर पर बात करते हो और जब घंटो इंतजार करने के बाद कस्टमर केयर फोन नहीं उठाता है। यहां पर एक बात और गौर करने वाली है कि पेटीएम की कस्टमर केयर का नंबर अन्य कंपनियों की तरह टोल फ्री नहीं है बल्कि किसी भी सामान्य कॉल की तरफ इसका का भी बैलेंस आपके खाते ही कटता है ये तो वही बात हो गई…पैसा भी मेरा, परेशानी भी मैं झेलू, और उसी पैसे को वापस पाने के लिए दोबारा पैसे भी मैं ही खर्च करूं।

फोन कॉल के अलावा अगर आप ईमेल के जरिए इस कंपनी को शिकायत दर्ज कराने की कोशिश करते हैं तो आपको मेल बान्स बैक आएगा। यानि की कंपनी की तरफ से आपको कोई रिस्पान्स नहीं दिया जा रहा है। पेटीएम के जो गत दिनों हालात और केस सामने निकलकर आ रहे हैं उससे तो साफ है कि इस तरह ई-वॉलेट का सपना साकार नहीं होने वाला है। वर्तमान में जो स्थिति है उससे ना सिर्फ ग्राहक परेशान हो बल्कि उसके मन में कंपनी के प्रति रोष व्यापत है कि उसका पैसा ना तो उसके काम आ रहा है और ना ही उसके खाते में जमा है।

अब जरा इस मामले को कानूनी नजरिए समझने की कोशिश कीजिए सवा सौ करोड़ आबादी वाले इस देश में अगर महज 10 करोड लोग ही पेटीएम का इस्तेमाल करते हैं। रोजाना सिर्फ 1 लाख लोगों के 500 रुपये ही फंसते हैं और 15 दिनों तक वापस नहीं किए जाते अब इन पैसों पर पेटीएम को मिलने वाला ब्याज जोडि़ए। जनता के पैसे लूटकर जनता के ऊपर बादशाहत दिखा रही है।

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आरबीआई का नियम कहता है कि यदि कोई भी व्यक्ति, कंपनी किसी का भी पैसा 7 दिनों से ज्यादा अपने पास रखता है तो उसको इसके ऊपर ब्याज जोड़कर उसे वापस करना होगा। 500 रुपये के हिसाब से 10 लाख लोगों के रोजाना पैसा फंसा तो उससे आम जनता को कोई फायदा तो नहीं हुआ लेकिन उस पैसे पर आरबीआई से पेटीएम को कितना ब्याज मिला। अगर एक दिन में आरबीआई एक करोड़ रुपये ही ब्याज देता है तो एक साल का ब्याज जोड़ लीजिए। कंपनी के दोनों हाथ घी में और सिर कढ़ाई में है।

अब सवाल ये हैं कि क्या पेटीएम लोगों को पैसा ब्याज जोड़कर देगी। अगर नहीं तो करोड़ों रुपये जिस पर जनता का हक है उसे कंपनी के मालिक अपनी अय्याशियों में खर्च करेंगे। जो ब्याज कंपनी को मिल रहा है उस पर पूरा हक आम जनता का है।

सवाल सिर्फ पेटीएम कंपनी पर नहीं उठने चाहिए बल्कि केंद्र सरकार पर भी उठने चाहिए, जो इस तरह की कंपनियों को बैंकिंग लाइसेंस दे रही है। कौन से आधार है जिस पर बैंकिंग लाइसेंस दिया जा रहा है। जो कंपनी जनता का 500 रुपये सही तरीके से ले और दे नहीं पा रही है वो करोड़ों रुपये कैसे संभालेगी। जनता इस तरह की कंपनी पर विश्वास कैसे करेगी। कंपनी छोड़िए सरकार पर कैसे विश्वास करें। पेटीएम पर मोदी की तस्वीर अपने आप एक बड़ा सवाल है कि क्या मोदी ने पैसे लेकर प्रचार किया है।

पूरा देश वैसे भी नोटबंदी से काफी परेशान है हालातों में अब भी वो व्यापक सुधार नहीं हो पाया है। जिस वक्त देश नोटबंदी की मार झेला रहा था, कड़ाके की ठंड में लोग एटीएम की लाइन में लगे हुए थे। उस वक्त लोगों को देश के प्रधानमंत्री के साथ की आवश्यकता थी, क्योंकि किसी भी देश का प्रधानमंत्री उस देश की जनता के लिए माता-पिता कि तरह होता है और माता-पिता खुद ठंड में ठिठुर लेते है लेकिन बच्चों के बदन पर कपड़े जरूर पहनाते है।

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सवाल है क्या मोदी ने देश की जनता का माता-पिता होने का फर्ज अदा किया.. जवाब मिलेगा नहीं जब देश की जनता ठंड में ठिठुर कर नोटबंदी की मार झेल रही थी उस समय मोदी गर्मएसी वाली गाड़ी में विदेशों की यात्राओं में लगे हुए थे। जब देश के लोगों को सारी समस्याएं खुद ही खत्म करनी है तो ना देश को ऐसी कंपनी की जरूरत है और ना हील ऐसे प्रधानमंत्री की।

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